जीवन के कुछ हल्के-गहरे रंगों से बुने जीवनपट की गाँठों से अनुभव लेकर, टूटे तानों को जोड़ने की कोशिश करने में बीतती जिंदगी, तमाम विडम्बनाओं और विद्रूपताओं के बावजूद कितनी खूबसूरत, स्वप्निल और कोमल होती है, यह किसी से छुपा नहीं है या तो हम स्वयं भागते हैं या फिर ठहर कर भागती हुई दुनिया को देखते हैं। देखने-देखने में भी बड़ा अंतर होता है।
आप एक तमाशबीन की तरह भी देख सकते हैं और एक सिद्ध की तरह भी। ऐसे ही भागने और ठहरने में भी अंतर है। आप महत्वाकांक्षा की फिरकी में लगे आरों की तरह बेहताशा पागल होकर दौड़ सकते हैं और आपको यह एहसास भी निरंतर होता रहेगा कि आप सचमुच दौड़ रहे हैं। यथार्थतः आपको यह बोध भी हो सकता है कि आपका स्थान और समय बदल रहा है पर क्या वास्तव में ऐसा है? आरे तो अपनी जगह फिरकी से जुड़े हैं। भले ही पुनः-पुनः परिक्रमा के कारण वे यह नहीं जान पाते की वे जहाँ थे, वहीं हैं।
यर्थातस्थिति का यह बोध ठहरकर ही हो पाता है मैंने जहाँ से, जिस जगह से, जिस क्षण से, उम्र के जिस पड़ाव में यह बोध प्राप्त किया, मैं जीवन का वहीं से प्रारंभ मानती हूँ।
वरना तो -
यह खाली मुसाफिर खाना है,
यहाँ आना है और जाना है,
कुछ सुनकर सदा को लौट गए,
बाकि तो मुसाफिर बहरे थे।
कुछ रंग हैं हल्के-गहरे-से,
परछाईयों-से या चेहरे-से।
वे लोग न जाने अब हैं कहाँ?
जो सच के ख़ातिर ठहरे थे,
कुछ रंग हैं हल्के-गहरे-से,
सुबह के होंठों पर खामोशी,
शाम की पलकों पर सन्नाटा,
दिन दीवाना करता क्या,
वीरानी के पहरे थे,
कुछ रंग हैं हल्के-गहरे-से,
है अज़ब-सा मौसम बस्ती में,
हर तरफ आग, हर तरफ धुआँ,
मुख डिबिया में मार कुंडली,
बैठी है चुपचाप ज़ुबाँ,
ज़हर बुझे तीरों की तरह,
अब चुभते समय के फेरे ये,
कुछ रंग हैं हल्के-गहरे-से,
बीजूका के मीत सभी,
पर की है क्या
उससे प्रीत कभी?
बीजूका के कंधों पर,
दो थके पखेरु ठहरे थे,
कुछ रंग हैं हल्के-गहरे-से,
परछाईयों-से या चेहरे-से।
सुप्रसिद्ध रचनाकार, आलोचक एवं कव्यत्री प्रो. कुसुमलता मलिक एक समर्पित समाज सेविका भी हैं जो वर्तमान में राष्ट्रीय दृष्टिहीन संघ में महिला उपाध्यक्षा के पद से संघ की सेवा में रत हैं। इससे पूर्व वे अखिल भारतीय महिला मंच की दो बार अध्यक्षा रह चुकी हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में भी वे अपने व्यवसाय के साथ-साथ समाजसेवा के बहुत-से काम करती हैं । उनकी सेवा के कारण ही एक अध्यापिका के रूप में उनकी विशिष्ट पहचान है।